Sunday, December 28, 2014

भारत रत्न का मतलब क्या है..?

2008 में लाल कृष्ण अडवाणी ने मनमोहन सिंह को चिठ्ठी लिखी थी कि अटलजी को भारत रत्न दिया जाए. अडवाणी की इस चिठ्ठी पर कांग्रेस ने गौर तो किया लेकिन कुछ दिन बाद होने वाले आम चुनाव को देखकर अटलजी की जगह भीमसेन जोशी को भारत रत्न दे डाला.
सवाल सम्मान का नही सम्मान की निष्पक्षता का है.
बिस्मिल्लाह खान को जब 2001 में अटलजी ने भारत रत्न दिलवाया था तो क्या वो कोई मुस्लिम कार्ड की राजनीती कर रहे थे ?
सवाल मोदी सरकार में अटल के सम्मान का नही है सवाल मनमोहन सरकार में अटल को ठुकराने का है.
देश के सबसे बड़े सम्मान का निर्णय भी अगर दलीय राजनीति और वोट बैंक के आधार पर किया जायेगा तो भारत रत्न का मतलब क्या है ?
जरा सोचिये पदमश्री, पदम् भूषण और पुलिस मैडल किस आधार पर दिए जाते होंगे ?
और हाँ ! ध्यानचंद की अबतक उपेक्षा क्यूँ ?
क्या मुफलिसी में जीने वाले ध्यानचंद ...क्या साईकिल से चलने वाले ध्यानचंद ...क्या इलाज़ के लिए सरकारी अस्पातालों की लाइन में लगने वाले ध्यानचंद ....भारत रत्न के बीपीएल (बिलो पावर्टी लाइन) कैंडिडेट है ?
मोदीजी एक चाय वाला एक साईकिल वाले को कैसे भूल गया ?

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Friday, December 26, 2014

जिसने की शरम उसके फूटे करम

कांग्रेस के बेहद करीबी लोग जानते हैं कि मनमोहन सरकार की लगाम माँ सोनिया ने राहुल गाँधी को ही सौंप रखी थी. 2009 में मनमोहन जब दुबारा प्रधानमंत्री बने तो राहुल गाँधी पहले से भी ज्यादा ताकतवर हो चुके थे. 2010 जाते जाते माँ सोनिया अपने एकलौते बेटे को दिल्ली की गद्दी पर बैठाना चाहती थी लेकिन बेटा घोड़े पर बैठने को तैयार ही नही था. बारात चढ़ती भी तो कैसे चढ़ती .
सत्ता की शक्ति जंगल के शेर की तरह है. या तो शेर पर सवार हो जाईये या फिर उससे दूर हो जाईये. या तो सत्ता की शक्ति का प्रयोग करिए या इस प्रचंड शक्ति को त्याग दीजिये. राहुल गाँधी इस प्रचंड शक्ति के साथ साथ तो चले लेकिन पांच साल तक ये तय नही कर पाये कि शक्ति का प्रयोग करना है या उसे त्याग देना है. राहुल की इस किंकर्तव्यविमूढ़ता को देश के एक बड़े वर्ग ने नालायाकी माना. उन्हें पप्पू साबित किया. उन्हें राजनीति में नॉन-सीरियस नेता बताया. इसी कन्फ्यूज़न में राहुल जनाधार खोते चले गये. और आज जनता की भीड़ में राहुल अकेले हैं..
लेकिन सच ये भी कि देश के 5000 साल के इतिहास में राहुल उस दुर्लभ प्रजाति में गिने जायेंगे जिन्होंने राजपाठ को ठुकराया है. जिन्होंने घर के सेवक को देश का प्रधान सेवक बनवा दिया. जो राजा होकर भी पप्पू बना रहा . लेकिन एक बात मित्रों आपको माननी पड़ेगी. इस पप्पू पर अब तक पाप का ग्रहण नही लगा है . जिस देश में सिपाही को नौकरी हथेली गरम करके मिलती हो, जिस देश में विधायक और मंत्री घटिया दर्जे की चापलूसी के सहारे बनते हों, जिस देश में प्रधानमंत्री का उमीदवार बनने के लिए पार्टी टूट के कगार पर पहुँच जाती हो ...उस देश में राहुल जैसा नालायक सिर्फ एक ही है.
इसलिए वक़्त आ गया है कि राहुल अब पार्टी से खुद कहें की मुझे अध्यक्ष बनना है. उन्हें खुद को श्रेष्ठ घोषित करना होगा . अपने "मन की बात" पब्लिक से खुद कहनी होगी . नकली लालकिले पर चढ़ कर खुद बोलना होगा. आई एम द बेस्ट . भले ही उनपर जितने इलज़ाम हो तोहमतें हो . पर खुद अपने को प्रोजेक्ट करना है. उन्हें देश भर में अपनी मार्केटिंग करनी होगी. हर बैनर, पोस्टर, पम्पलेट पर सिर्फ और सिर्फ अपनी तस्वीर लगानी होगी. खुद का कद 100 साल की पार्टी से बढ़ा करना होगा. पप्पू भाई सत्यमेव जयते नही ..स्वार्थमय जयते पर चलो . अगर मोदी से नही तो केजरीवाल से ही कुछ सीख लो .
ये बाज़ार का दौर है. ये बिकने दिखने के फार्मूले पर चलता हे. भाई राजनीति अब रामराज नही रही जहाँ एक धोबी के कहने पर बुरा मान जाया करते थे. ये वक़्त बेशर्मी का है ...खुद बोलो मै बदल दूंगा भारत . मै बदल दूंगा सब कुछ ...खुद बोलो
मै करूँगा ... सिर्फ मै ही कर सकता हूँ, ..सिर्फ मे हूँ. .मै..मै और मै.
राहुल साहब आपको विरासत में देश का सबसे बड़ा राजनीतिक घराना मिला है. अपनी ताकत पहचानो . आपके पड़ नाना , दादी, पापा ..सब प्रधान सेवक रहे हैं ..तो फिर क्यूँ संकोच कर रहे हो यार.
याद रहे राजनीती संकोच से नही स्वार्थ से की जाती है . स्वार्थ लेकर आगे बढ़ो निसंकोच आगे बढ़ो,...अगर बेशर्मी के साथ खुद को जनता में बेच सकते हो तो बेचो वर्ना पप्पू भाई इस कीचड से दूर हो जाओ. तुम्हारी बहन ज्यादा लायक है.
तुम्हारे पास तो सिर्फ माँ है
प्रियंका के पास वाड्रा है.
वाड्रा ही अडानी की काट है.
जय भारत..

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Friday, March 7, 2014

मोदी का खेल बिगाड़ रहा है केजरीवाल का छापामार स्टाइल

मालूम नहीं कि अरविंद केजरीवाल को क्रिकेट पसंद है या नहीं, लेकिन वो खिलाड़ी जोरदार निकले। वो सियासत की पिच पर उतरे सबसे नए खिलाड़ी हैं, जो चुनावी मैच में आए दिन पुराने दिग्गजों को अपनी नई-नई गुगली गेंदों से क्लीन बोल्ड कर रहे हैं।

केजरीवाल की खतरनाक सियासी बॉलिंग शुरू हुई दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों से, जब किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि वो कोई अंतर पैदा कर पाएंगे। कांग्रेस की दिग्गज नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केजरीवाल के बारे में पूछने पर सवाल किया था, "कौन हैं वो?"

जिस दिन ईवीएम मशीन खुलीं, शीला को इस सवाल का ऐस जवाब मिला, जो उन्हें ताउम्र याद रहेगा। आम आदमी का नाम लेकर 'अलग राजनीति' करने उतरे अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के बाद अब भाजपा पर हमला बोल रहे हैं, क्योंकि जंग अब विधानसभा नहीं, बल्कि लोकसभा की है। और इस मैदान में उन्हें निशाना हाथ के बजाय कमल पर लगाना है।
दिल्ली में सरकार से इस्तीफा देने को लेकर आम आदमी पार्टी की भले कितनी आलोचना हुई हो, लेकिन राजनीतिक जानकार यह समझ सकते हैं कि इसके पीछे सोची-समझी रणनीति थी। केजरीवाल छापामार स्टाइल की राजनीति करने के लिए जाने जाते हैं, जो परंपरागत सियासत करने वाले नेताओं को समझने में कुछ वक्त लग जाता है।

जन लोकपाल को मुद्दा बनाकर राजधानी की गद्दी छोड़कर केजरीवाल ने एक तीर से दो शिकार किए। सिद्धांतों के नाम पर कुर्बानी भी हो गई और लोकसभा चुनावों के लिए हाथ खाली हो गए। अगर वह दिल्ली में बने रहते, तो लोकसभा के लिए इस तरह धुआंधार प्रचार कतई नहीं कर सकते थे।

दिल्ली की कुर्सी से उठने के बाद वो लोकसभा चुनावों की तैयारियों में लगे और शुरू कर दिए हमले। शुरुआत में उन्होंने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को लपेटा। लेकिन जब यह साफ हो गया कि कांग्रेस पर हमला बोलना अपने हथियारों की धार को जाया करना है, तो फोकस मोदी पर लगाया।
कांग्रेस के अलावा नरेंद्र मोदी पर हमला बोलने के लिए किसी असरदार ह‌थियार की जरूरत थी और वो उन्हें मिला मुकेश अंबानी के रूप में। दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस हो या कानपुर में चुनावी रैली, केजरीवाल ने तरकाश से अंबानी और गैस के दाम वाले तीर निकाले और चला‌ दिए मोदी पर।

लेकिन इस मुद्दे पर नरेंद्र मोदी की चुप्पी ने उन्हें बल भी दिया और अपने हमलों को आक्रामक बनाने का बहाना भी। केजरीवाल ने शब्दबाण छोड़ने के बाद फैसला किया कि उन्हें मोदी का मुंह खुलवाने के लिए मैदान पर उतरना होगा।

और फिर शुरू हुआ दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री का चार दिवसीय गुजरात दौरा। और इस दौरे का हरेक दिन मीडिया को मसाला देने के अलावा आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को वो तरजीह भी दिला रहा है, जो दिल्ली की सरकार चलाने के वक्‍त उनसे खो गई थी।
सियासत भी इत्तफाक का लुत्फ ले रही है। जिस रोज केजरीवाल का गुजरात दौरा शुरू हुआ, ठीक उसी दिन सवेरे चुनाव आयोग ने वोटिंग के कार्यक्रम से परदा हटा दिया और लागू हो गई आदर्श आचार संहिता।

इस बीच दिल्ली से हजार किलोमीटर फासले पर गुजरात में चुनावी पारा उस वक्‍त आसमान पर पहुंच गया, जब गुजरात पुलिस केजरीवाल को आधे घंटे के लिए अपने साथ थाने ले गई। यह गुजरात सरकार का सेल्फ-गोल साबित हुआ। इस घटना को केजरीवाल ने इस तरह पेश किया कि गुजरात में विकास के दावों की पोल खोलने से जुड़े उनके कार्यक्रम से मोदी डर गए हैं और इसलिए उन्हें रोकने की कोशिश हो रही है।
कांग्रेस को चारों ‌खाने चित करने के ख्वाब देख रहे नरेंद्र मोदी के लिए केजरीवाल का दौरा अचानक नया सिरदर्द बन गया है। उनकी सियासत का स्टाइल पूरी तरह अलग है और बार-बार चौंका रहा है।

शनिवार को वह गुजरात में रैली करने जा रहे हैं और तीन दिन में जुटाई गई जानकारी के आधार पर मोदी पर हमला बोलने के लिए पर्याप्त असलाह उनके पास होगा। दावों में दम हो न हो, हथियार जरूर हैं। और चुनावी रण में हथियार जरूरी हैं।

केजरीवाल का हमलावर रुख रुकने वाला नहीं है। और मोदी को इस सिरदर्द की दवा जल्द करनी होगी, क्योंकि केजरी आगामी चुनावों में खुद कितने भी सीटें बटोरें, भाजपा की उम्मीदों में पलीता लगाने का डर जरूर पैदा कर रहे हैं। अब तक कामयाब रहे मोदी के रणनीतिकारों को बल्लेबाजी के लिए नए गुर सीखने होंगे क्योंकि फिलहाल केजरीवाल की लाइन-लेंग्‍थ और गुगली, दोनों असरदार हैं।