राहुल गांधी को घड़ी-बेघड़ी परदेस में छुटियों का चस्का पड़ रहा है क्या?
अकेले भी तैयार, परिवार निकले तब भी तैयार! सोनिया सरकार को दूर से चलाती
रहीं, राहुल पार्टी के साथ शायद यही प्रयोग करने लगे हैं! कोई अच्छे आसार
नहीं। जब सरकार मौके पर मौका दे रही है हमले का, पार्टी के बीच राहुल की
मौजूदगी संघर्ष का हौसले और रंगत दोनों को बदल सकती थी। कार्यकर्ताओं का
मनोबल रामभरोसे है। दिल्ली में प्रेस-वार्ताओं भर की कार्रवाई है; राजस्थान
और मध्यप्रदेश में भूचाल उठ जाना चाहिए था, वहां कोरी बयानबाजी का सहारा
है! ... शायद जैट-लेग से उबर कर कुछ जलवा दिखाएं!

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